इन्सान को सबसे जयादा अक्लमंद माना जाता है . मगर सायद आज कल इन्सान अक्लमंद होने के साथ साथ, आपने कम को भी भूलने लग रहा है . कम का आर्थ यहाँ पर रोजमरा के दिनों के कम से न होकर, कर्तव्य से है
आज का इन्सान आपने ऊपर कुछ भी कम लेने से डरता है . सोचता है की क्या ये सही होगा की किसे कम को लिया जाये या ये सही होगा की किसे तरह से इश कम से बचा जाये, चारो और इशी तरह का माहोल बनता देखाई दे रहा है. अगर आज के इंसान का किसी कम से फायदा हो रहा हो तो वो उशे करने से पेचे नहीं हठता , बल्कि ये नहीं सोचता की किसी और को आपने फायदे से जायदा नुकसान हो रहा हो. दूसरी ओर देखावे की ताकत इतने बड़ गए है की मनो कोए सच बोलना ही नहीं चाहता . बस देखावे की लिये घूट पे घुट बोल सकते है. ये इन्सान कभी भी नहीं सोच सकता की जिश दिन उश्का झूठ पकड़ मैं आया तो क्या उशकी चावी रह जाएगी.
इन दोनों पशो को ले के जो समाज की इश्तिथि हो गए है उशे न ही उधर जा सकता है और न ही कुछ और सोचा जा सकता है , हर किसी को कर्तव्य से भागना पसंद है . और बात करने मैं आपने को इश कदर दिखाना की सायद संसार का ये १ ही प्राणी है जो जी रहा है या जीना चाहता है. उशे किस कम से किसे हानि होती है , ये उशे नहीं सोचना. उसका कम होजाना चाहए बस.
कार्य के बार मैं वो मासा अलाह है, कोए कर्तव् लेने को वो राजी ही नहीं होते. हर दिन कम से बचने की कोसिस कहे , या कम पूरा न हो पायेगा इश बात का दर.
असे ही महान इंसानों की बदोलत चल रहा हिया संसार, ये सब को साथ ले के चलने की न सोच के साब पे अलग अलग राज करने की सोचते है, अगर कुछ न हुआ तो भी ये तो जी जायेगे ही. ये लोग सिर्फ जी सकते है जीवन के सफ़र का उदेश्य पूरा नहीं कर सकते .
इश तरह की इंसानों से ही संसार मैं तरकी नहीं हो पा रही है, और जो इन्सान सब को साथ मैं ले के चलने की सोचे . ये उसे जेने नहीं देते. इनकी ये परवर्ती , परिवर्तन को लेन नहीं देती.!
लेखक : श्री गोविन्द सिंह मेहरा