January 25, 2011
October 12, 2010
वक़्त नहीं………
हर खुशी है लोगों के दामन में ,
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं .
दिन रात दौड़ती दुनिया में ,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं .
माँ की लोरी का एहसास तो है ,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं .
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके ,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं .
सारे नाम मोबाइल में हैं ,
पर दोस्ती के लए वक़्त नहीं .
गैरों की क्या बात करें ,
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं .
आँखों में है नींद बड़ी ,
पर सोने का वक़्त नहीं .
दिल है घमों से भरा हुआ ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं .
पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े ,
की थकने का भी वक़्त नहीं .
पराये एहसासों की क्या कद्र करें ,
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं .
तू ही बता इ ज़िन्दगी ,
इस ज़िन्दगी का क्या होगा ,
की हर पल मरने वालों को ,
जीने के लिए भी वक़्त नहीं ………
July 27, 2010
अपने कार्तव्य से भागता फिरता है इंसान !
इन्सान को सबसे जयादा अक्लमंद माना जाता है . मगर सायद आज कल इन्सान अक्लमंद होने के साथ साथ, आपने कम को भी भूलने लग रहा है . कम का आर्थ यहाँ पर रोजमरा के दिनों के कम से न होकर, कर्तव्य से है
आज का इन्सान आपने ऊपर कुछ भी कम लेने से डरता है . सोचता है की क्या ये सही होगा की किसे कम को लिया जाये या ये सही होगा की किसे तरह से इश कम से बचा जाये, चारो और इशी तरह का माहोल बनता देखाई दे रहा है. अगर आज के इंसान का किसी कम से फायदा हो रहा हो तो वो उशे करने से पेचे नहीं हठता , बल्कि ये नहीं सोचता की किसी और को आपने फायदे से जायदा नुकसान हो रहा हो. दूसरी ओर देखावे की ताकत इतने बड़ गए है की मनो कोए सच बोलना ही नहीं चाहता . बस देखावे की लिये घूट पे घुट बोल सकते है. ये इन्सान कभी भी नहीं सोच सकता की जिश दिन उश्का झूठ पकड़ मैं आया तो क्या उशकी चावी रह जाएगी.
इन दोनों पशो को ले के जो समाज की इश्तिथि हो गए है उशे न ही उधर जा सकता है और न ही कुछ और सोचा जा सकता है , हर किसी को कर्तव्य से भागना पसंद है . और बात करने मैं आपने को इश कदर दिखाना की सायद संसार का ये १ ही प्राणी है जो जी रहा है या जीना चाहता है. उशे किस कम से किसे हानि होती है , ये उशे नहीं सोचना. उसका कम होजाना चाहए बस.
कार्य के बार मैं वो मासा अलाह है, कोए कर्तव् लेने को वो राजी ही नहीं होते. हर दिन कम से बचने की कोसिस कहे , या कम पूरा न हो पायेगा इश बात का दर.
असे ही महान इंसानों की बदोलत चल रहा हिया संसार, ये सब को साथ ले के चलने की न सोच के साब पे अलग अलग राज करने की सोचते है, अगर कुछ न हुआ तो भी ये तो जी जायेगे ही. ये लोग सिर्फ जी सकते है जीवन के सफ़र का उदेश्य पूरा नहीं कर सकते .
इश तरह की इंसानों से ही संसार मैं तरकी नहीं हो पा रही है, और जो इन्सान सब को साथ मैं ले के चलने की सोचे . ये उसे जेने नहीं देते. इनकी ये परवर्ती , परिवर्तन को लेन नहीं देती.!
लेखक : श्री गोविन्द सिंह मेहरा
October 12, 2009
शहर की इस दौड में दौड के करना क्या है?
शहर की इस दौड में दौड के करना क्या है?
अगर यही जीना हैं दोस्तों… तो फिर मरना क्या हैं?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िकर हैं……
भूल गये भींगते हुए टहलना क्या हैं…….
सीरियल के सारे किरदारो के हाल हैं मालुम……
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुरसत कहाँ हैं!!!!!!
अब रेत पर नंगे पैर टहलते क्यों नहीं……..
१०८ चैनल हैं पर दिल बहलते क्यों नहीं!!!!!!!
इंटरनेट पे सारी दुनिया से तो टच में हैं…….
लेकिन पडोस में कौन रहता हैं जानते तक नहीं!!!!
मोबाईल, लैंडलाईन सब की भरमार हैं……….
लेकिन ज़िगरी दोस्त तक पहुंचे ऐसे तार कहाँ हैं!!!!
कब डूबते हुए सूरज को देखा था याद हैं??????
कब जाना था वो शाम का गुजरना क्या हैं!!!!!!!
तो दोस्तो इस शहर की दौड में दौड के करना क्या हैं??????
अगर यही जीना हैं तो फिर मरना क्या हैं***! !!!!!!!
August 25, 2009
एक बोध कथा
एक बोध कथा
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , ” काँच की बरनी और दो कप चाय ” हमें याद आती है ।
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं …
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची … उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ … आवाज आई … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ … कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई …
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ….
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी …
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है … यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा … मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ … टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है …… पहले तय करो कि क्या जरूरी है … बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि ” चाय के दो कप ” क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया …
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।
( अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो …. मैंने अभी - अभी यही किया है )
March 28, 2009
mer pahad
मेरापहाड़सेक्यारिश्ताहैयेबतानामैंआवश्यकनहींमानतापरपहाड़मेरेलिये
